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10.06.2007
 
दोहे
डॉ० राजेन्द्र गौतम

कुछ दोहे इस दौर के, कुछ उस युग की बात
कहें सुने शायद कटे, यह अंधियारी रात

चिड़िया के दो बोल हैं, वेणी के दो फूल
कह छुपा रख दूँ इन्हें, हो न सकें जो धूल

जीवन को महका गए वेणी के जो फूल
उनकी यादों की भरी अब कमरे में धूल

कल सपने में मिल गया वह बचपन नादान
गाड़ी की धकधक सुने धर पटरी पर कान

बीते बरस हजार हैं लेकिन अब तक याद
जंगल की झरबेर का खट्टा-मीठा स्वाद

चल कर रेगिस्तान से, हम भी पहुँचे खूब
पाँवों को झुलसा गई, रिश्तों की मृदु दूब

अपना सब कुछ फूँक हम कब के हुए फ़कीर
तुम्हें न कुछ भी दे सके, क्या अपनी तकदीर

धर कर नभ की देहरी, चंदन, अक्षत, दूब
सूरज सब को नमन कर, गया सिंधु में डूब

भीगी आँखें ताकते दूर तटों से फूल
खंड-खंड जलयान था, डूब गए मस्तूल

रिक्त हुआ मन-पात्र है, या नीला आकाश
ग्रह-नक्षत्रों को मिली, जीवन भर की प्यास

नीली काया वक्त की, लेकिन एक न घाव
डसता पर कब दिखता, काला नाग तनाव

खेत प्यास से जल रहे, झुलसे सब सीवान
पत्थर के गणदेवता, क्या देते वरदान
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