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02.10.2008
 

बरगद जलते हैं
डॉ० राजेन्द्र गौतम


इस जंगल में आग लगी है
बरगद जलते हैं

भुने कबूतर शाखों से हैं
टप-टप चू पड़ते
हवन-कुंड में लपट उठे ज्यों
यों समिधा बनते

अंडे-बच्चे नहीं बचेंगे
नीड़ सुलगते हैं

पिघला लावा भर लाई यह
जाती हुई सदी
हिरणों की आखों में बहती
भय की एक नदी

झीलों-तालों से तेज़ाबी
बादल उठते हैं

उजले कल की छाया ठिठकी
काले ठूँठों पर
नरक बना घुटती चीखों से
यह कलरव का घर

दूब उबलती, रेत पिघलती
खेत झुलसते हैं


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