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| 08.11.2007 |
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बाँस बरोबर आया पानी डॉ० राजेन्द्र गौतम |
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बादल आए इंद्रधनुष ले टूट पड़ी सेना अंबर से हुए पराजित गाँव। बाँस बरोबर आया पानी बहती जाती छप्पर-छानी फिर भी मस्ती में ’रजधानी‘ यों तो उत्सव-संध्याओं में चर्चे इनके ही होते हैं पर आशंकित गाँव। ढाणी, टिब्बों फोग-वनों में कैसा छाया ’सोग‘ मनों में भय का फैला रोग जनों में बिजली कोड़े बरसाती है
खाल उधेड़ी इसने तन की किधर गया रलदू का कुनबा बिखर गया हरदू का कुनबा बदलू का भी डूबा कुनबा बोल लावणी के कजली के सब गर्जन-तर्जन में डूबे छितरा जित-तित गाँव। |
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