डॉ० राजेन्द्र गौतम


कविता

उजाला छिन न पाएगा
कसबे की साँझ
चिड़िया का वादा
टपक रहीं हैं खपरैलें
तैर रहे हैं गाँव
द्वापर-प्रसंग
दोहे
पंख ही चुनते रहे
पाँवों में पहिए लगे
पिता सरीखे गाँव
बरगद जलते हैं
बाँस बरोबर आया पानी
बाढ़ नहीं यह...
बिजली का कुहराम
मन, कितने पाप किए
महानगर में संध्या
मुझको भुला देना
वन में फूले अमलतास हैं
वृद्धा-पुराण
शब्द सभी पथराए
सिर-फिरा कबीरा
हम दीप जलाते हैं

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