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ISSN 2292-9754

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11.17.2014


तिजारती

बहुत कुछ था पास मेरे
निश्छल आँखों में
उभरते सपने
कलेजे में
अँखुआती आशाएँ
घरौंदे उम्मीदों के
दुधमुँहीं किलकारियाँ
धरोहर खिलखिलाहटें -
बेतरतीब होठों की ;
खिलती उम्र की पंखुड़ियाँ

पहले तिजारत की
फिर रौंद डाला उसने
वहशी, आदमखोर की तरह।

मेरे पास थी नैतिकता
ईमान और सच्चाई
सौदा किया जिसका
मंडी ने जबरन।

मेरे पास था खून और पसीना
पुष्ट हुई जिससे
तिजारती तिजोरियाँ
आलीशान गगनचुम्बी ईमारतें

अब था शेष मेरे पास आँसू
बाज़ नहीं आए फिर भी, तिजारती
जानते नहीं वो शायद
प्रशांत आँसू यह
काफी है डुबाने लिए
उत्तुंग हिमालय!


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