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ISSN 2292-9754

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04.01.2015


शव परीक्षण - गृह

सावधान
शव-परिक्षण गृह है यह
परीक्षण की प्रतीक्षा में
बिखरे हैं शव जहाँ
किसी की तलाश में
थरथराते कदम बढ़ रहे मेरे
दीवारों पर लिखा है -
'नहीं मरे ये अपनी मौत
की गई हत्याएँ इनकी'
कई श्रेणियों में बँटी
पड़ी है अलग-अलग
कैसी विडम्बना है !
इनके रक्षकों ने की
हत्याएँ इनकी
पहचानने की कोशिश में
कदम बढ़ाता हूँ
तार-तार वस्त्रों वाली
सर्वांग नोची- खसोटी -
विदीर्ण चेहरे वाली,
लाश नैतिकता की।
नग्न लाश यह -
श्रद्धा, लज्जा,मर्यादा की
जंज़ीरों में जकड़ी लाश -
स्वतंत्रता आज़ादी की।
सभ्यता संस्कृति की गर्दन कटी,
फेफड़े मानवता के नदारद;
मुँह पर पट्टी विकलांग व्यवस्था के,
निकला कलेजा करुणा का
अधमरी न्याय प्रणाली कोमा में
असंख्य टुकड़ों में कटी निर्धनता ,
क्षत-विक्षत शव बिखरे सर्वत्र
किसकी शरण जाऊँ किधर?


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