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ISSN 2292-9754

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12.02.2014


नारी!

पहली बार मिली तुम
धमनियों में होती प्रवाहित
दुग्ध धवल माँ की ममता में

दूसरी बार फड़कती रही
बहन की प्रेरणा बन भुजाओं में

तीसरी बार उमड़ी थी
सहचरी के साहचर्य में
प्राणवायु बन कलेजे में

चौथी बार मिली तुम
पुत्री की निश्छल किलकारी में

प्रवाहित होती रही सर्वत्र
जीवन धारा बन अविरल
श्रद्धा स्वरूपा, सौम्या, स्निग्धा
पुचकारती, सँवारती, दुलारती
प्रकृति, बुद्धि, शक्ति,
क्षुधा, तृष्णा, तृप्ति
लज्जा, अनुरक्ति

सारे रूपों में विद्यमान
नारी तुम ही हो,
अनन्या।


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