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ISSN 2292-9754

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04.01.2015


जोंक

रंग बदलते
गिरगिट जैसे
मायावी थे वे
प्रारम्भ से
चिपक गए चुपके
सुविधा, अवसर का
लेता रहा आनंद मैं भी
नशा छाता गया
बदहवासी का,
ज़ारी रहा सिलसिला
चुभन दंशन का।
उस दिन देखा मैंने
न रक्त, न मज्जा शरीर में
बचा ढाँचा ठठरियों का
_ और बेजान मैं।
मेरी हड्डी, रक्त मज्जा से बने
ईंट-गारे से उसने
गगनचुम्बी महल
अनगिन, खड़े कर डाले।
किन्तु इधर
था नहीं अकेला मैं
चारों तरफ कराहते
नर - पिंजर, असंख्य
चिंगारियाँ आँखों से
लगीं छिटकने।
उस दिन देखा मैंने
रक्त से हमारे, बदन फुलाए
लप-लपाती जिह्वा वाले
फणधर - विषधर बने
लगे फुफ्करने अब वे।
विषैले दाँत उनके
तीक्ष्णतर होते गए
फिर भी हम उन्हें
दूध ही पिलाते रहे
होश आया जब हमें
गुज़र गईं थीं सहस्राब्दियाँ
प्रतिज्ञा की हमने -
'अब दूध न पिलायेंगे;
चटा देंगे नमक जोंकों को,
विषधर बनने से पहले।


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