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ISSN 2292-9754

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11.17.2014


बेटी

माँ ! गाय तो नहीं मैं?
बाँध दो जिसे
किसी खूँटे में अनचाहे
कसाई के हाथ धरा दो पगहा

कोई चूल्हा तो नहीं मैं ?
अरमानों की अंगीठी जिसमें
हरदम धुआँती रहे ,
या अंगारा बन धधकती रहे

चक्की भी नहीं मैं
कलेजे पर जिसके
ज़िंदगी भर कोई
मूँग दलता रहे

ढिबरी थी कभी मैं
चौका, आँगन, ओसारे
करती थी उजाला

अब लालटेन दरवाज़े की,
पेट्रोमैक्स सभाओं की,
राजपथ की मरकरी,
सड़क से संसद तक
धरती से आकाश पर्यन्त
गार्गी, मैत्रेयी, गोदावरी
बछेंद्री, कल्पना से आगे
कुछ और बनने प्रक्रिया में
माँ बढ़ने दो निरंतर मुझे
दहेज़ के हवन कुण्ड का हव्य नहीं मैं
रूपकुँवर नहीं, चिंगारी हूँ मैं
जला राख कर दूँगी जंगल परम्परा के।


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