अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
07.24.2014


सावन बहका है

लो, सावन बहका है
बूँदों पर है खुमार, मनुवा भी बहका है।

बागों में मेले हैं
फूलों के ठेले हैं,
झूलों के मौसम में
साथी अलबेले हैं।

कलियों पर है उभार, भँवरा भी चहका है।

ऋतुएँ जो झाँक रहीं
मौसम को आँक रहीं,
धरती की चूनर पर
गोटे को टांक रहीं।

उपवन पर हो सवार, अंबुआ भी लहका है।

कोयलिया टेर रही
बदली को हेर रही,
विरहन की आँखों को
आशाएँ घेर रही।

यौवन पर है निखार, तन-मन भी दहका है।


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें