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04.28.2014


फैसला

वे मंदिर के प्रांगण में प्रवेश कर रहे थे तभी संजू दिखा उन्हें। माता के दरबार में हाज़िरी लगवा के लौट रहा था।

उन्हें ताज्जुब हुआ... ये तो रोज़ शाम सात बजे आता है दर्शन करने, आज इस समय...!
लगता है आज पेशी है इसकी...., हाँ इसमी माँ कह रही थी।

संजू ने झुककर उनके पाँव छूये तो आँखों के पलवा भर आये। संजू देख न ले अपने बाप को इस तरह कमज़ोर होते हुए, सो उसके सिर पर हाथ रखकर जल्दी से वे मंदिर के छोटे द्वार में झुककर भीतर प्रवेश कर गये।

फिर कनखियों से देखा उसे, वह सदा की तरह मुस्कराता हुआ कोई गीत गुनगुनाता चला जा रहा था। उन्हें धीरज बँधा, लड़का चिन्तित नहीं है मुक़द्दमे को लेकर ज़्यादा।

संजू पर बहुत दया आती है उन्हें। ...बेचारा सीधा सादा पढ़ाकू लड़का कहाँ फँस गया फालतू के चक्करों में!

माता को योनिमुद्रा बना कर प्रणाम किया और उनके दरबार के बाहर के बरामदे में अपने बैठने की जगह पहुँचकर संग लाया आसन बिछाया और लाल रंग की अपनी लुंगी सँभालते हुए पालती लगा कर बैठ गये।

झोले में से एक और आसनी निकाली उसे सामने बिछाया, उस पर कमलगटा और हरिद्रा की माला निकाल कर रखी। मालाओं को प्रणाम किया, एक मिनट देवी का ध्यान किया, फिर अभ्यस्त ढंग से कमल गटा की माला उठा कर विपत्ति और घोर संकट से विमुक्त करा देने वाले पाँचों हं कारनामधारियों का मंत्र बुदबुदाने लगे- हरं हरिं हरिष्चन्द्रम, हनुमन्तम हलायुधम; पंचकः हं जपे नित्यं घोर संकट नाशनम्!

इसके बाद हल्दी की बनी माला से ‘गं गणपतये नमः’ का जाप शुरू कर दिया। एक माला ‘बं बटुकाय नमः’ की करके देवी का जाप करेंगे। आज कितना जप करेंगे, यह अभी तय नहीं किया है, जितना हो जाय कर लेंगे। सुबह से साँझ तक जप ही जप चलता रहता है उनका। दिन में आठ-दस घण्टे पूजा-पाठ करते हैं, अकेली देवी नहीं, महादेवजी, रामचन्द्रजी का भी आराधना करते हैं वे। एक पंडित के कहे अनुसार ‘दीनदयाल विरिदु संभारी, हरउ नाम मम संकल भारी’ का संपुट लगा कर सुन्दर काण्ड का पाठ भी करते हैं।

पहले कोई पूजा-पाठ नहीं करते थे वे, मन में भाव ही नहीं रहता था उन दिनों साधना या भक्ति का। कुछ तो युवावास्था में हरेक युवा के मन में आ जानेवाला आंशिक नास्तिकता का भाव और कुछ संतोषी सदा सुखी वाली भावना के कारण इस तरफ कभी ध्यान नहीं दिया उन्होंने। वो तो संजू के लिए ये सब जतन कर रहे हैं, जतन ही नहीं मन में अगाध विश्वास सा हो चला है कि इन पूजा पाठों से बचा लेंगे वे अदालत से संजू को। वे भी इस उम्र में संजू की तरह मस्त रहा करते थे। बल्कि संजू से भी छोटी उमर से...।

जब से होश संभाला एक कल्पनाशील प्राणी और भावुक व्यक्ति के रूप में खुद को पाया उन्होंने, इसी कल्पनाशीलता का ही तो परिणाम था कि अक्षर ज्ञान हुआ साहित्य लिखने लगे वे। किस्से-कहानियों और कविताओं में खूब मन रमता उनका। इधर मन जवान हुआ और उधर कविताऐं। कलम सधी तो ऐसी-ऐसी कवितायें लिख डालीं उन्होंने कि अगर उन्हें मंच पर तरन्नुम से कविता पढ़ने वाले कवि सुन लें तो मुँहमाँगे दाम देकर ख़रीद लें उनसे, हाँ उनके मन में हर से हर इतनी ही कल्पना थी कि उनकी कविताएँ कोई खरीद लेगा उन्हें तो कभी मौका न मिलना नहीं है न छपने का ना ही किसी मंच से पढ़ने का। लेकिन छोटा सा क़स्बा और उस पर कवि इतने कि कंकर फेंक दो तो कवि पर जाकर गिरे, सो उनकी कविताओं की किसी ने तारीफ़ नहीं की कभी। सब जल कुक्कड़ साले, अपनी तुकबंदी उम्दा कविता दिखती और उनकी बेहतरीन कविता को यूँ सुन कर रह जाते मानों मर्सिया सुन रहे हों। वे अपने मन की बात बच्चों से कहते, बच्चों यानी कि छात्रों से से, हाँ ग्यारहवों दर्जा पास करते ही नौकरी मिली सो पूरे तन मन से भावी पीढ़ी को शिक्षित करते रहते थे। एक ग्रामीण स्कूल में मास्टर थे वे।

ब्याह हुआ और पत्नी ऐसी सुंदरा मिलीं कि अप्सरा भी पानी भरे उसके आगे, लेकिन समस्या यही कि सुंदर खूब थी वह और गुमान रत्ती भर भी नहीं। एक कवि को भला यह कहाँ से सुहाता कि सौंदर्य को अपना गुमान ही न हो। उस पर साक्षरता में ऐसी कि लिख लोड़ा और पढ़ा पत्थर। उसने कभी यह जानने का यत्न नहीं किया कि मेरे पति दिन रात क्या कागद गूदते रहते हैं। उसे अपनी गृहस्थी भली और घर के काम काज। न बनाव शृंगार आता उसे न दुनिया भर की बातें। जब पति से अकेले में मिलती तो उसे समझ ही न पड़ता कि क्या बोले, और वे उसकी सुंदरता में कुछ बोलते भी तो वो ऐसे धूनमथान हो जाती कि वे अपने साहित्य संसार में ही कुलटइयाँ खाते रहते। न पत्नी की सुंदरता की तारीफ़ की कभी न उसके मन में घर के अलावा किसी कऔर काम के प्रति लगाव जगाया। सो दोनों की दो दुनिया बन गईं। वे सिर्फ उतने काम के ज़िम्मेदार रहे जो पत्नी बता देती और उसे जैसे-तैसे सुलटा करके वे फारिग। स्कूल में तो रहता ही कितना काम है, वहाँ से लौटते तो सीधे किसी कवि मित्र के घर जाकर जम जाते। कुल मिला कर भले ढंग से ज़िंदगी चल रही थी जिसमें न ज़्यादा महत्वाकांक्षायें थी न ज़्यादा कमाने की हवस। हवस तो औरत को भोगने की भी न थी उन्हें। सो पहलौटी की लड़की हुई संजना और उसकी पीढ़ का लड़का हुआ संजू। बस मनु स्मृति का पूरा पालन किया उन्होंने। हाँ घर से बाहर बहुतेरी कविता प्रेयसी थीं उनकी, जो उनसे मनुहार करके कविता सुनतीं और जब वे नारी देह का उन्मादक वर्णन करते तो वे समझतीं कि उन्हें ही लक्ष्य करके कविता लिखी गई है, और बहुत कुछ था भी ऐसा सो ‘श्रोता वक्ता ज्ञान निधि कथा राम की गूढ़’ की स्थिति हो जाती दोनों के बीच।

संजना बचपन से ऐसी चंचल ऐसी शरारती कि मन मोह लेती सो जल्दी ही हिय का हार बन गई वह अपने बाप की। वे दिनभर उसे लादे फिरते। जबकि बेटा केंऊ केंऊ करता रिरयाता फिरता, वे ध्यान ही न देते। दरअसल दोनों का स्वभाव विपरीत था अपनी जोनी से, संजना मर्दाना हरकतें करती और संजू जनाना। बचपन में ही फ्राक पहनना ज़्यादा अच्छा लगता उसे जबकि संजना हमेशा लड़कों के कपड़े पहनती। क्रिकेट, बॉलीबाल, हॉकी और फुटबाल जैस लड़कों के खेल खेलती थी वह, और वे उसे वकअप कराते। उनकी शह पाकर बेटी दबंग घोती जा रही थी, जबकि पत्नी उसे डाँटती थी हर रोज़- "संजना ठीक से बैठो, कपड़े ठीक करो अपने, ये हर पल दाँत काहे को दिखाती हो, तनिक दूर से बात किया करो सबसे।"

वो उन्हें बताती वे उसे निश्फल कर देते, "तुम कान मत दिया करो उनकी कही पर। वे तो ऐसी ही हैं। जो मन में आये वही किया करो।"

...मन्दिर में आज साँझ संगत होगी, एक साजिन्दा तमाम साज पोंछने लगा है। वे चौंके अरे हाथ की अँगुली रुक गई हैं, जप बन्द है और वे जाने कहाँ खोये बैठे हैं। फिर खुद को दिलासा दिया, चलो अभी तो बारह बजे हैं ज़्यादा समय नहीं हुआ।

उधर गोमुखी में हाथ की अँगुली गति पकड़ती है और इधर मुँह में जुबान। लेकिन मन पर किसका वश है? वह तो भटक कर घर की उन्हीं परेशानियों पर जा पहुँचता है जिनसे दो चार हो रहे हैं वे आजलकल।

...संजना को उन दिनों ब्यूटी पार्लर को कोर्स करने का शौक चर्राया था सो सुबह उठकर वह वहाँ चली जाती। वह बी. ए. कर चुकी थी, जबकि बी. एससी. फर्स्ट इयर में पढ़ रहा संजू उन दिनों अपने सुखद भविष्य के सपनों मे डूबता उतराता दिन भर किताबों से भिड़ा रहता था। सारा कमरा अस्त-व्यस्त रहता उसका और वह बिना नहाये धोये सदैव कुछ न कुछ रटाता रहता। संजना से एक अजब सी दूरी बन गई थी उसकी। जाने क्या बात थी कि भाई बहन में कतई नही पटती थी। वे स्कूल से लौटते और संजू को कमरे में बंद पाते तो नाराज़ होते, अपनी आँखे खराब कर रहा है लड़का! दिन भर कमरे में बंद पड़ा रहता है, चल उठ तनिक यार दोस्तों से मिल ले, गली में टहल ले थेाड़ी देर।

उनके डर से वो सहमा सा उठता और नामचार के लिए घर से बाहर निकल जाता फिर पता नहीं कब चुपके से आता और अपने कमरे में घुस जाता, वे देख कर भी अनदेखा कर देते- ये लड़का अपनी सेहत खराब कर लेगा ऐसे, पता नहीं कैसा घर घुस्सा है, न कोई यार-दोस्त न किसी से जान-पहचान, हर जगह संकोच करता है, कैसे जीवन बितायेगा अपना।

...और तभी वो हादसा हो गया था, रजिस्टर खरीदने चौराहे पर गये संजू ने बदहबास हो कर बताया था, "पाप्पा...पापा, वो संजना को उठा ले गये कुछ लोग!"

वे चौंके, "क्या बोल रहा है, संजना... अपनी संजना।"

"हाँ पापा, वो ब्यूटी पार्लर सेंटर से लौट रही थी कि रास्ते में चिन्टू उठा ले गया उसे।"

"कौन चिन्टू ...?" उनका स्वर टूट रहा था।

"वो गप्पे पहलवान का लड़का।"

"उसकी ये मजाल! पर क्या हुआ, बता तो तनिक ढंग से। चिन्टू की कैसे पड़ी ये हिम्मत। ...संजना क्या जानती थी उसे।"

"पता नहीं, कोई कहता है कि वो खुद हँस के उसकी कार में बैठ गई, तो कोई कहता है कि कनपटी पर पिस्तौल रखदी थी चिन्टू ने।" संजू को इतना बोलने में ही पसीना आ गया था। पसीना तो उन्हें भी आ गया एकाएक, ...घबराहट भी बढ़ी। सोचा, चलो बाज़ार चल कर पता करते हैं कि कैसे हुआ ये हादसा। ....मन अचकचा गया, किससे पूछेंगे कि मेरी बेटी को उठाते तुमने देखा क्या भाई !...उल्टा हँसेंगे सब के सब। सहसा घबराहट बढ़ गई, इस लड़की ने तो नाक ही कटा दी। अब किस मुँह से बाहर निकलूँगा। थू थू करेंगे सब। च्च च्च च्च अरी नामुराद तूने क्या किया ये।

वे टूट गए यकायक भीतर से, और बिस्तर पर गिर पड़े। आँखों के आगे अँधेरा था और मन के आगे गहन अवसाद। बरसों की कमाई इज़्ज़त और अकड़ मिटा दी इस लड़की ने..., माँ सच कहती थी इसकी कि लड़की है तो लड़कियों की तरह रहे। ... क्या बचा अब ज़िंदगी में। पल-पल अवसाद बढ़ रहा था उनको और लग रहा था कि बेइज़्ज़त होने से बेहतर है कि रेल के आगे कूद कर जान दे दें, ज़हर खा कर मर जायें। चलें टाउन हाल के ऊपरी शिखर से कूद कर या सतखंडा महल के आखिरी कंगूरे से कूद कर ज़िन्दगानी खत्म कर दें। न जीयेंगे न किसी के ताने और कटाक्ष सुनने को मिलेंगे।

पत्नी ने हठात प्रवेश किया उनके कमरे में, "तुम कैसे मर्द आदमी हो, घर में घुस के औरतों की नपाँई रोय रहे हो, अरे कैसा बज्जुर जिया है आपका। अपनी बेटी को ले गया वो गुण्डा और हम उसके खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट लिखाने में भी शरम कर रहे है। चेत जाओ, अभी समय है, और जाकर थाने में रपट लिखवाओ, हो सकता है कि अभी कस्बे में ही कही छिपा रखा हो, जितनी देर करोगे उतनी दूर चली जायेगी अपनी इज़्ज़त। न हो तो चलो अपन दोनों गप्पे पहलवान के घर चलें, कछू पिगार न पायेंगे तो अपनी जान होम तो कर देंगे। मरिवे के पहले दो-चार को मारि देंय तो मरिवों भी शांति से होयगो। पहले अपने हक के लिए लड़ो तो फिर कोई रास्ता न बचे तो जो मन में जो आये सो करों।"

"मेरी कौन सुनेगा थाने में ? वहाँ न मेरा कोई जान पहचान वाला न नाते रिश्तेदार ..." लगभग रो उठे थे वे।

"पुलिस कचहरी में काउ की जरूरत नहीं है, अपन जाके ऊंसेई फरियाद कर सकत हैं। और तुम का कोई गली-छेंड़ी के रदउवा-रमसींगा हो, कस्बा के नामवर कवि हो, अखबारन में तुम्हारी कविता फविता छपती रहत सो को नहीं जानता होगा, ...और फिर तुम्हारे वे सारे कवि दोस्त वे भी तो मदद करेंगे।"

पत्नी ने सहसा उबार लिया उन्हें मृत्यू की ओर बढ़ते अवसाद बोध से। वे चेते और तैयार हुए, "हाँ थाने तो जाना ही चाहिये उन्हें।"

नीचा सिर किये ही थाने तक गये वे। लेकिन जो वे सोचते थे वही हआ, वहाँ जो दारोगा डयूटी पर था वो न उन्हें जानता था न उसने उनका नाम तक सुना था। जब उन्होंने अपने कवि होने की दुहाई दी तो कैसा विदूषकों की नाई हँसा था वो, और बोला था "कवि हो ता इधर थाने में क्या काम आपका?’

"मेरी बेटी उठा ले गया वो चिन्टू गुण्डा।...वो गप्पले पहलवान का लड़का।" वे अपनी आवाज़ दमदार बनाते बोले।

"तो...? तो ढूँढो उसे। क्या उमर थी उसकी? बालिग होगी तो क्यों परेशान हाते हो, अपनी मरजी से गई होगी मास्साब। जाने उसे अपने आप घर लौट आयेगी और न लौटे तो भी तुम्हारे सिर से शादी-ब्याह की चिन्ता उतर गई।" बहुत उचक्का और उजड्ड था वो पुलिस दोरोगा।

उन्हें लगा दीवार से सिर दे मारें। लेकिन पत्नी की बात याद आई, यों अपना नुकसान क्यों करें, अपने हक के लिये पहले लड़ें फिर ना हो तो जो मन मे आयें करें।

...संयोग से तभी एक सिपाही थाने में घुसा और उन्हें देखते ही बोला, "अरे मास्साब आप यहाँ?...कैसे आये?"

उसने झुक कर पाँव छू लिये उनके। वे इस घटना से दिलासा से भर गये। लगभग रोते हुए बोले उस अन्जान सिपाही से जिसने उनक पाँव छूये थे, "हम पहचान नहीं पाये तुम्हें। अब का बतायें कै कैसे आये ...? वो गप्पे पहलवान का लड़का है न, वो चिंटू गुण्डा वो मेरे बेटी को अगवा कर ले गया। रिपोर्ट लिखवाने आये हैं।"

सिपाही ने उनकी बात ध्यान से सुनी और बोला तो आओ बैठ के लिख दो क्या कहनो है।

धीरज के साथ वे बैठे, वो निर्लज्ज दारोगा अपने कान खुजाता मोबाइल पर किसी से बतिया रहा था, उनकी ओर से निर्पक्ष बना हुआ।

कागज पर अपना कवि होने से मास्टर होने का पूरा परिचय और साथ में यह भी कि तनखा में से इनकमटैक्स कटाते हैं हर साल। सो सरकार से अपनी तकलीफ कह कर मदद करने का हक रखते हैं वे, उन्होंने पूरा घटनाक्रम लिखा और उस सिपाही को दे दिया।

"बस आप घर जाओ, अब पुलिस देख लेगी सारा मामला।" कहते सिपाही ने आदर से उनकी दरख्वास्त ली और उन्हें आश्वस्त किया।

दारोगा को रोष भरी निगाहों से घूरते वे उठे और बाहर आ गये।

घर तक उनकी निगाहें नीची रहीं। पत्नी को सारा घटनाक्रम बताया तो वह भी आश्वस्त हुई, "चलो भगवान ने थाने में भी अपना मददगार भेज दिया। अब संवर जायेगा सब। चलो हाथ मुँह धोओ और रोटी खालो ..."

वे चौंके, कैसी माँ है यह, घर से जवान बेटी लापता है और यह खाना-पीना की बात कर रही है। लेकिन पत्नी सामान्य थी, उनसे रोज़ की तरह आग्रह करती हुई।


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