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छोड़ो साधारण ‘मेलों’ को
ई-मेल को युग आयो भय्या।
ई-मेल हजारों करता पर
आनन्द नहीं वह मिलता है
जो मिलता कागज लिखने में
जो भाव इकट्ठे करता हूँ
ई-मेल समा नहीं पाता हूँ
गलती से बटन दब गया तो
आधी ही चली गयी भय्या
छोड़ो.....
मिलता संतोष मुझे कितना
जब कागज पर लिख लेता हूँ
और मोड़ पत्र को छोटा कर
लिफाफे में भर देता हूँ
लिख पता, लगाकर टिकट उचित
चल देता निकट लाल बक्से
खिड़की को खोल डाल देता
कर देता विदा भाव अपने
फिर मन ही मन सोचा करता
पहुँचा होगा या ना भय्या
छोड़ो.....
इतना रोमाँचित सुख अनुभव
ई-मेल कहाँ दे सकती है
यह तो उस नौसिखया जैसी
जिसको न प्यार है ना प्रीति
पर राज्य इसी का है भय्या
सो हम भी ई-मेल करें भय्या
औ’ तुम भी ई-मेल करो भय्या
छोड़ो....
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