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बदलें चिन्ता को चिन्तन में
जब पास तन्हाई आए
कुछ लोग हीं ढूँढते अपने भीतर
बाकी को तन्हाई खाए सताए।
ऋषि मुनि बैठ शिला पर
किसी घनघोर जंगल में
ब्रह्म शक्ति खुद में जगाते,
ढक निज को तन्हाई के आँचल में।
करते करते निज में अनवेषण
प्रज्ञा चढ़ चिन्तन पर चिन्ताएँ चरती है
बदलते तन्हाई को जो योगकाल में
तन्हाई उन्हीं का तम हरती है।
जब जब चिन्ता बदला है चिन्तन में
नव राह वहाँ से जना है
भागे हैं राजमहल से राजकुमार
तन्हाई में तपकर कोई महावीर और बुद्ध बना है।
डँसती खाती उनको तन्हाई
जो केवल चिन्ता में फँसते है
योगरूढ़ तो दुनिया में
तन्हाई ढूँढते फिरते हैं।
चिन्ताओं के गहरे बादल में
चिन्तन तड़ित चमक है
योगी खींचे तन्हाई में नयी लकीरें
भोगी रोए कह कह तन्हाई तो दीमक है।
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