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03.15.2008
 

कैद प्यार
प्रो. राजकिशोर प्रसाद


आँखें लड़ी हिया में उठने लगा ऊँच ऊँच हिलोर
कहीं मधुवन में बरसने को था आतुर घटा घनघोर।

बातें यों फैल गयी मानो जंगल में लग गयी लुट्टी
दुनिया ही पीछे पड़ गयी लेकर बाधा और पट्टी।

वो क्षण किसीने न जाना जब आँखें हुई थी चार
आज किसने न जाना पीछे आँखें पड़ी थी हजार।

कैद पiरंदा होता है गगन पर किसका जोर चला है
घेर रखे जो मगन मन को ऐसा iपंजरा कहाँ बना है।

हर विकट घेरे में भी छिपा रहता है जरूर एक मौका
काली बदरी के बीच ही चमका करती है लौका।

कल आग लगी मेरे मरई में ठीक हुआ सब राख हुआ
उसने दिया भर पानी की गगड़ी बड़ा मधुर एहसास हुआ।


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