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किसी गणितज्ञ से एक लड़की ने कर लीं आँखें चार
बढ़ी बेचैनी, नींद गयी, जा बोली आपसे हुआ प्यार।
गोनूदास थे गणितज्ञ बाबू, किये काफी रूखा व्यवहार
एक-एक नियम से हार गये, तब मान लिये कि हुआ प्यार।
इधर दीवानी मीरा थी, सावन-भादों आ गयी आँखों में
दिल की झनक सुन, खनक गयी कंगन हाथों में।
मानसून बरसा खूब इधर, जब बीता वक्त इंतज़ारों में
भ्रमर न जाए तो सच रोते हैं गुल गुलज़ारों में।
आए हिरासत में एक दिन बेचारे, प्रेयसी ने आँसू का हिसाब
की
बोली- बहा दिए आठ-आठ आँसू जब से आँखें चार हुई।
हिसाब किताब का माहिर पंडित बोला, कौन बड़ी सी बात हुई
केवल आठ आँसू बहे, जबकि आँख कुल मिलाकर चार हुई।
ठनका माथा प्रेयसी का, सारा हिसाब अनसोल्वड रहा
प्रेम-पिच पर गणितज्ञबाबू पहले बॉल पर बोल्ड हुआ।
जीत प्यार की होती है, नफरत हरदम हारी है
बोले हारकर गणितज्ञ बाबू, माना तेरी-मेरी यारी है।
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