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03.15.2008
 

अन्वेषण
प्रो. राजकिशोर प्रसाद


प्रकृति ने सब कुछ रखा है,
जीवन सुखद बनाने को
मगर सुलभता नहीं हैं,
सब सुखद चीजें अपनाने में।

दृश्य नहीं है, श्रव्य नहीं हैं,
छिपा है गहन आवरण में,
है जरुरत अन्वेषण और
श्रमजल की, गोचर उसे बनाने में।

रहस्यों में रहस्य छिपा है,
सब तमाशा है तहखाने में,
बरगद का बृहत वृक्ष रखा है,
एक सरसों भर दाने में।

सफर दूब से दूध तक हो,
या फूलों का खिलना-मुरझाना
पूरा विज्ञान विरंची का,
कभी कहाँ किसी ने जाना।

अन्वेषणि बुद्धि ही रहस्य में,
छिपा तथ्य बतलाती है
हटा आवरण पे आवरण,
नियति को दर्पण दिखलाती है।

अन्वेषण के बल हीं मनु-जीवन,
आज अन्य जीवों से इतर है,
हमारी इन अव्वलताओं के पीछे,
अन्वेषण और श्रमजल है।

अन्वेषण में जहाँ लोग लगे हैं,
आज धरती उनकी इतर है
सुख-सम्पदा बसती वहाँ,
लोगों का जीवन वहाँ बेहत्तर है।

आराध्य और साध्य सभी को,
साधक हीं पा सकता है,
कुछ अद्भुत विज्ञान प्रभु का,
अन्वेषण ही बतला सकता है।


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