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03.15.2008
 

आईना
प्रो. राजकिशोर प्रसाद


काश अगर मैं आईना होता
तुम देखती मुझको बार-बार,
तू अपनी सूरत देखती मुझमें
मैं तुम्हें निहारता बार-बार।

स्नानघर से निकल जब
आती तुम मेरे सामने,
चाँद मेरे पास होता
जब सजती तू मेरे सामने।

सज धज कर जब, दूर तुम जाती
कुछ चुरा कर रखता अपने पास,
जिसे सजाने फिर तुम आती
दौड़ी-दौड़ी मेरे पास।


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