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ISSN 2292-9754

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02.04.2015


रो रही हस्तिनापुरी

घूमती धरती जतन से बाँधकर अपनी धुरी

कुछ समझ आए न
होगी सेंध कितनी और गहरी
जंग में उलझे हुए हैं
इधर गँवई-उधर शहरी
मुँह कहे श्रीराम पीछे भोंक देता है छुरी

पेड़ के पत्ते झरे सब
कट रही हैं टहनियाँ
तालियाँ हिन्दू बजाते
आरियाँ पकड़े मियाँ
खोल अपने बाल दौड़ीं शक्तियाँ सब आसुरी

बोलियों पर बोलियाँ
बढ़ती गयी ज़िंदा रकम
आज होगा फैसला
है कौन ज़्यादा-कौन कम
मुँह छिपाते हैं पितामह रो रही हस्तिनापुरी


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