अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली
ISSN 2292-9754

मुख पृष्ठ
06.15.2014


नियम भाव सब भंग हुए

मन इतना क्यों अ-स्थिर है, हम क्यों इतने तंग हुए !

पटक-पटक सर, खीझ खुदी पर
रोते रहे नवा के माथ
फूलों की सब गंध किन्तु, अविचल
उड़ गयी हवा के साथ
मुस्काती, उड़ती तितली के पंख आज बेरंग हुए!

तार-तार हो छिटकी आशा
रहन-सहन की गति बदली
अलग हुये संबंध, बड़प्पन
छूटा, सबकी मति बदली
न्यायमूर्ति अब हँसते-हँसते, अन्यायी के संग हुए!

शिशु के मस्तक पर फिरते थे
जननी के दुलराते हाथ
आँचल की वह ओट नहीं अब
बच्चों के घर हैं फुटपाथ
जप-तप, दान-ध्यान के शाही नियम-भाव सब भंग हुए!


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें