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ISSN 2292-9754

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06.15.2014


मुक्तक

सुप्त जल में कंकण फेंकता है कोई
रुका हुआ पानी फिर से बुलबुला देता है
पहाड़ जैसा दुख हो या हो काँटों सी ज़िंदगी
..........वक़्त सब कुछ भुला देता है

हर कोई हर हुनर में पाक़ नहीं हो सकता
काम गर है जो अधूरा भी काम आता है
न समझिए किसी को छोटा और खुद को बड़ा
गाँव में है जो धतूरा भी काम आता है

हर बात में जो खुद को बुद्धिमान समझते हैं
छोटी सी भी तारीफ को यशगान समझते हैं
उनके सिवाय भी थी ये दुनियाँ इसी तरह
पर जाने क्यूँ वो दुनियाँ को नादान समझते हैं

जैसे चाहें खर्च करें यह शाम आपके ऊपर है
काम करें या कर लें फिर आराम आपके ऊपर है
मित्र बनायें सगरे जग को, जीत लें सबका दिल
या रणभेरी बजा करें संग्राम आपके ऊपर है

दोराहे पर खड़ा हूँ, प्यासा-खाली पेट
एक तरफ बीड़ी जली, एक तरफ सिगरेट
बाहर दुनिया जल रही, लपटें- भीषण आग
मैं अब भी सुलझा रहा, मन के लाग लपेट

बार-बार चिर सत्य सामने आता है,
हर बार उसे मन झुठलाने की कोशिश करता है
जोड़- जोड़ कर जीवन भर बाँधा पूँजी की गठरी
पर अंत समय वह एकाकी लावारिस बचता है..........

सब के सुख में सुख, सभी के ग़म से ग़म हो
आदमी के बीच दूरी, कम से कम हो
टूट जाएँ वर्जनाएँ, ऐसा प्यारा घर बनायें
और मिट जाए, जो मन में कुछ वहम हो


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