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ISSN 2292-9754

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09.04.2014


मुक्तक-२

 १.
देह पर अपने भले ही सर नहीं रहे
पर याद रखना दोस्तों, तेवर वही रहे
हम हों भले जंगल में, रोटी घास की खायें मगर
जो घर हमारा है, हमेशा घर वही रहे
२.
लाल-पीला या हरा से रंग अपना है अलग
इस जहाँ को देखने का ढंग अपना है अलग
पीठ में छुरा डुबोकर जीत के इस जश्न पर थू
सामने का वार हूँ मैं, जंग अपना है अलग
३.
प्रण है स्वार्थसिद्धि की खातिर
दरबारों का चारण नहीं बनूँगा मैं
रण में हार मिले पर छल से
किसी हार का कारण नहीं बनूँगा मैं
४.
बिना प्रयोजन जो कुछ है उन सब पर ताला दे दो
देशद्रोह के अपराधी को ...........देश-निकाला दे दो
भरे हुए लोगों के घर को भरना अब तुम छोड़ो
पिचके हुए पेट को आओ चलो निवाला दे दो
५.
जिसने बचपन को दुत्कारा उसे जवानी मत दो
भ्रष्टतंत्र की अमरबेल को फिर से पानी मत दो
जीवन में अपने बहुतेरे काम पड़े हैं यारों
फ़िरकों के बहकावे में आकर कुर्बानी मत दो
६.
जहाँ के लोग खुशमिज़ाज़ दिल से ज़िंदा हैं
ये शख़्स भी तो उसी शहर का बाशिंदा है
जान बाज़ुओं में ना हो, पंख में भी ना हो
पर हौंसलों से उड़ेगा ये जो परिंदा है
७.
इस शहर में हर तरफ़ मची अंधेरगर्दी है
आदमी ने दुनियाँ की ये कैसी हालत कर दी है
आबरू लुटने लगी उनके ही हाथों तो क्या करें
जिनके कंधों पे सितारा बदन पे वर्दी है
८.
जाना था ख़ुरज़ा, ख़रगौन पहुँचता है
ख़बरों की सच्चाई तक कौन पहुँचता है
बोल-बोल कर, चिल्लाकर थक-हार गये
तब जाना मंज़िल तक मौन पहुँचता है
९.
मैं एक का ठिकाना हूँ, दूसरे का घर हूँ
ख़ुद में हूँ तीसरा मैं, चौथे का पक्षधर हूँ
मैं हूँ नहीं किसी का, सब हैं हमारे अपने
तिनका हूँ डूबते को, तैराक को भँवर हूँ


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