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ISSN 2292-9754

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12.29.2014


मेरा अर्थ मेरी ‘अर्थी’ तक

 मैं लकीर का फ़कीर था
खाना-पीना-सोना
जब भी मेरे अपने वकालत करते थे
मैं ठप्पा लगा देता
यही तो ज़िंदगी है
कौन महँगी-कौन सस्ती
कैसी माथापच्ची
चार दिन जीना है करो मौज मस्ती
क्या झूठी-क्या सच्ची
जीवन है रेत
मृत्यु केवल राख़
सो, बनो चार्वाक
यावत् जीवेत् ....... घृतम् पीवेत्

लेकिन आज
मैं बदला हुआ हूँ
मेरा होना
नहीं सीमित केवल मेरे होने तक
यह विस्तृत है नक्षत्रलोक तक - मेरे स्वप्नलोक तक
सूर्य की ऊष्मा और चाँद की शीतलता तक भी
उदयाचल-अस्ताचल तक
अंबर-आशीष और धरती के आँचल तक

जीना है मुझे अंतिम साँस तक
नहीं, मैं धरती पर बोझ नहीं
मेरा अर्थ है मेरी ‘अर्थी’ तक


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