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ISSN 2292-9754

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11.17.2014


हम दोनों का एक समर्पण

तिल-तिल कर जलें हम, संझवाती के दीये सा
रात-दिन मेहनत ही............... है अपना पेशा
सूर्य, चंद्र, तारों से आज भी लगाते हम समय का अनुमान !

....मैं मजदूर - तू किसान !

नवागंतुक वीर शिष्यों की उपज का पर्व है
देश ख़ातिर जान हाज़िर कर ख़ुदी को गर्व है
एक है उद्देश्य हम हैं एक राह के निर्भय राही !

....मैं शिक्षक - तू सिपाही !

जड़ें गहरी हैं बहुत सद्भावना के दुश्मनों की
जाल में फँस ढो रहे हैं बोझ सारे उलझनों की
अब हमें ही है बचाना एकजुट हो साथ करके वार !

....मैं कलम - तू तलवार !

कील हो तुम नाव की मैं अश्वपद की नाल हूँ
दिन तुम्हीं वर्षान्त के, मैं तरोताज़ा साल हूँ
एक दूजे के लिए हम कर चुके सर्वस्व रस-कलश अर्पण !

....हम दोनों का एक समर्पण!


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