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ISSN 2292-9754

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10.14.2016


 हे आतंकवादियो!

क्यों बने हो जीव होकर
जीव के ही प्राणभक्षक
क्या नहीं यह जीव के जीवत्व के विपरीत है
स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष इति
जो नाशपथ के चिह्न हैं
यह जानकर भी उधर जाना अधम और अनीति है

मिल न सकता चैन है
जीवत्व का प्रतिकार करके
प्राप्त होगा क्या विचारो
जीव का संहार करके
अमर कोई भी नहीं सुखभोग कितने दिन करोगे
साथ जायेगा नहीं कुछ, सृष्टि की यह रीति है

दाँव पर केवल नहीं
मानव तुम्हारे बालपन के
जल रही सम्पूर्ण मानवता
तले हिंसक हवन के
देखकर दुर्विध सिमटती जा रही निर्दोष दुनियाँ
आज सबका मन सशंकित और सब भयभीत हैं


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