राघवेन्द्र पाण्डेय राघव

कविता
अंधी दौड़
किसे कहूँ मैं युग-परिवर्तन
कौन हो तुम चोर!
क्रोध हूँ मैं
डर लगता है
.तो कैसे विश्वास करोगे
दु:ख का कारण
नियम भाव सब भंग हुए
मानव बनूँ
मुक्तक
मुक्तक-२
मेरा अर्थ मेरी अर्थी तक
रो रही हस्तिनापुरी
लेकर क्या करोगे
हज़ारों वर्षों की कमाई
हम दोनों का एक समर्पण
हे आतंकवादियो!
दीवान
एक दिल सीने में
ऊँचे-ऊँचे महल बने
ज़माना मुझको आँखों पर
प्यार मेरे द्वार आया
माना कि उसमें जज़्बा ख़ूब
शहर में कुछ गाँव होते
हम जिए जाएँ लम्हें हर..
हमने उनके वास्ते सब कुछ गँवाया
हर तरफ़ है छिड़ी समय को..
बाल-साहित्य
आओ अब स्कूल चलें
जाड़े की है सुबह
मैं नन्हा-मुन्हा बालक
अनूदित साहित्य
जीवन और मेरी संदूकची
साथ छूटा, स्वप्न रूठे
हास्य-व्यंग्य
जग में नहीं है आदर
लूट का सबसे बड़ा धंधा