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01.26.2012

जीत का जश्र
रघुविन्द्र यादव

मैं सुबह घर से जल्दी ही निकल लिया ताकि शाम होने से पहले काम ख़त्म करके वापस घर पहुँच जाऊँ। लगभग 20 किलोमीटर दूर ही गया था कि आगे रोड जाम थी। पता करने पर मालूम हुआ कि गाँव के बस अड्डे पर सुबह हिसार जाने वाली बस नहीं रुकती इसलिए लोगों ने जाम लगाया हुआ है। मैं गाड़ी साइड में लगाकर जाम लगा रहे लोगों के पास पहुँचा तो पाया कि वहाँ केवल 20-22 साल उम्र वाले 15-20 युवकों का एक समूह था, जिसने जाम लगाया हुआ था और कोई बुजुर्ग उनके साथ नहीं था।
युवक किसी की बात सुनने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि बस चाहे कितने लम्बे रूट की हो उनके गाँव से गुज़रे तो ज़रूर रुके। इसी बीच वहाँ राज्य परिवहन की एक बस आ गई। सारे युवक उस पर टूट पड़े। पहले पत्थरों और लाठियों से उसके शीशे तोड़ डाले और फिर उसे आग के हवाले कर दिया। इससे कई सवारियों को चोटें भी आईं। इसके बाद जो भी सरकारी वाहन वहाँ आता उसकी यही हालत युवक कर रहे थे। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की- "बसें तो राष्ट्रीय सम्पति हैं, बसें तोड़कर तो आप अपना और देश का ही नुकसान कर रहे हैं। आज जितनी बसें आप इस रूट की जला देंगे, कल उतनी इस रूट पर और कम हो जाएँगी।"
युवक बोले- "हमें देश से कुछ नहीं लेना, हमें तो ड्राइवरों की मरोड़ निकालनी है। आप अपना काम करो और हमें अपना करने दो।"
करीब आधे घंटे बाद पुलिस बल के साथ जीएम रोडवेज़ मौके पर पहुँचे और उन्होंने युवकों की माँगें मानकर जाम खुलवाया।
शाम को जब मैं वापस लौटते वक़्त उसी गाँव के पास पहुँचा तो सुबह वाले ही युवक सड़क पर आतिशबाज़ी कर रहे थे और नाच रहे थे । जिसके कारण जाम लगा हुआ था और दोनों ओर के वाहन सड़क खुलने का इन्तज़ार कर रहे थे। मैंने उतरकर उन युवकों से आतिशबाज़ी का कारण पूछा तो वे बोले- "भारत ने पाकिस्तान को क्रिकेट मैच में हरा दिया है। हम देश की दुश्मन पर जीत का जश्र मना रहे हैं।"
सुबह मामूली-सी बात पर राष्ट्रीय सम्पति को तोड़फोड़ कर आग के हवाले करके देश को लाखों का नुकसान पहुँचाने वालों की क्रिकेट में जीत पर देशभक्ति देखकर मैं स्तब्ध रह गया।
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