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02.17.2012

पौराणिक ऐतिहासिक नगरी अपराकाशीः फर्रूखाबाद
KapilAshram DraupidiKund
कपिलमुनि आश्रम द्रोपदी कुण्ड (काम्पिल्य)
किसी राष्ट्र की संस्कृति, सभ्यता, साहित्य तथा उत्थान पतन सम्मान का इतिहास प्रतिबिम्ब होता है। यह विभूतियों के योगदान को भी उजागर करने में विशेष सहायक होता है।
फर्रूखाबाद अध्यात्मिक पौराणिक और ऐतिहासिक नगरी है। पौराणिक धर्म ग्रन्थों में यह काली क्षेत्र, स्वर्गद्वारी, पंचकल्याणक, मोक्ष नगरी, अपराकाशी, परिचक्रा, काम्पिल्य, सिद्ध क्षेत्र तथा माकन्दी के नाम से उल्लिखित है। अपरा काशी अर्थात दूसरी काशी। जिस प्रकार पतित पावनी पुण्य सलिला माँ भागीरथी, वाणारसी नगर को अर्ध चन्द्राकार घेरे हैं। बनारस परिक्षेत्र के गली-गली में शिवालयों की भरमार है। नगर में जीव का भरण पोषण करने वाली माँ अन्नपूर्णा का वास है। द्वादश ज्योर्तिलिंगों में से एक बाबा विश्वनाथ का स्थान भी यहीं है। उसी प्रकार कम्पिल से श्रंगीरामपुर तक माँ गंगा फर्रूखाबाद के उत्तर दिशा में अर्ध चन्द्राकार कलकल प्रवाहित है। महा भारत कालीन पाण्डेश्वर शिवालय तथा मैया अन्नपूर्णा के रूप में (शिवालय के निकट ही) रेलवे रोड के मध्य अति प्रचीन पल्ला मठिया की देवी का आर्शीवाद श्रद्धालुओं को सुलभ है। नगर ही नहीं वरन ग्रामीण क्षेत्रों में ही शिवालयों की बहुलता इसका जीवन्त प्रमाण हैं। प्राचीन काल में आज के फर्रूखाबाद तथा कन्नौज जनपदों को काम्पिलय राज्य के नाम से जाना जाता था। जिस पर राजा द्रुपद, हरिषेण, ब्रह्मदत्त तथा आरूणी का आधिपत्य रहा। इसी पावन भूमि ने महर्षि चरक, सुश्रुत, जैवालि, कपिल मुनि एवं जैन तीर्थाकर विमल नाथ जी महराज जैसी विभूतियों को पोसा वहीं सांख्य दर्शन प्रणेता कपिल मुनि प्रवहण श्वेतकेतु ने अपनी तपस्थली बनाया। महाराज शत्रुधन द्वारा स्थापित रामेश्वर नाथ मंदिर में स्थापित शिवलिंग भारत के 84 सिद्ध पीठों में से एक है। यह परिक्षेत्र वैदिक, वैष्णव, शैव, शाक्त, नाग, जैन, बौद्ध संस्कृति का मिश्रित केन्द्र रहा है। आर्यावर्त के प्राचीन विश्व विद्यालय नालन्दा तक्षशिला की भाति कम्पिल विश्व विद्यालय यहीं स्थापित था। जिसमें अमीर खुसरो ने संस्कृत का ज्ञानार्जन किया था।
150 ई.पू. से 150 ई. तक के 300 वर्षों के अंतराल में 25 शासक हुये जिसमें सर्वाधिक लोकप्रिय राजा ब्रह्मदत्त हुए। इस काल खण्ड में साहित्य, इतिहास, तथा आयुर्वेद ने उत्कर्ष प्राप्त किया। कम्पिल के कथा क्रम में महाभारत कालीन चर्चा समाचीन होगी। इस क्षेत्र को पांचाल के नाम से भी जाना गया। महाभारत काल में पांचाल ने अत्यधिक प्रसिद्धि पायी। पांचाल के नृप पृषत के अवसान उपरांत नृपति द्रुपद ने शासन की बागडोर थामी। अग्नि तत्व से समादृत राजा द्रुपद की पुत्री द्रोपदी तथा पुत्र धृष्टधुम्न का जन्म यज्ञवेदिका से हुआ। यह यज्ञ कुण्ड कम्पिल में द्रोपदी कुण्ड के रूप में आज भी विद्यमान है। व्यूह रचना विशेषज्ञ धृष्टधुम्न ने महाभारत युद्ध में पांडवों की सहायता की थी। इस समय युद्ध कला शास्त्र ज्ञान, राजनीति और कूटनीति का स्तर अपने चरम पर था। यह सब विधायें गुरू द्रोणाचार्य के इर्द गिर्द ही घूमती थी। लाक्षागृह की घटना के उपरान्त पांण्डवों ने द्रोपदी स्वयंवर की चर्चा सुनी उन्होंने गंगा पार कर अज्ञातवास की अवधि यहाँ के वन क्षेत्र में व्यतीत की। इसी समय यहाँ शिवलिंग की स्थापना पाण्डवों द्वारा की गयी और यह शिवालय पांडेश्वर धाम (पंडाबाग) के नाम से से विख्यात हुआ। तत्पश्चात अर्जुन से मत्स्य भेदन कर द्रोपदी का वरण किया। यह मीन भेदन स्थल कम्पिल से तीन किलो मीटर पूर्व में भेदकुण्डा से जनश्रुत है। कम्पिल नगर के आसपास जिजौटा, मानिक पुर ग्राम महाभारत प्रसंग का अंश है।
काम्पिल्य की प्रश्सति में महाभारत के आदि पर्व 2/113 के अनुसार गंगा की घाटी में अवस्थित कम्पिल समृद्ध नगर गंग प्रच्छालित सुदृढ़ प्रसाद तोरणों वाला था। यथा-
‘‘पांचालख्य प्रदेशे अस्ति कम्पिला नाम सत्पुरी।
सित्पट-दिग्पटानां च धर्मस्थान सुशोभिता।।
हरिषेण-ब्रह्मदत्तौ भरतस्य च चक्रिणौ।
द्रोपदी प्रमुखचात्रसंजाता पुण्य शलिनः।।’’
यहाँ के प्राचीन तीर्थ स्थलों में भारद्वाज आश्रम, धौम्याश्रम, उत्कोचक सोमाश्रमायण तीर्थ एवं काम्पिल्य के साथ ही ऐतिहासिक नगरों में संकाश्या, भरेह, माकन्दी, विलसढ़ (विलासगढ़) कपित्थक (कथिया), सोरों, भोजपुर, असौली, जुझौरा, बिलराम, राजा का रामपुर, कुदरकोट, चकरनगर, मूसानगर, भीतर गाँव, जाजमऊ, कर्णपुर (कानपुर) शिवराज पुर, तथा आंवला की बस्तियाँ महत्वपूर्ण थीं।
फर्रूखाबाद का पौराणिक ही नहीं ऐतिहासिक महत्व भी है। यहाँ का जर्रा-जर्रा अपने में इतिहास समेटे है। कन्नौज (कान्यकुब्ज) राजा जयचंद की राजधानी के रूप में विख्यात है। राजा जयचन्द की पुत्री संयोगिता का वरणकर दिल्ली का राजा पृथ्वी चैहान हरण कर ले गया था। अंतिम हिन्दू शासक हर्षवर्धन की राजधानी का गौरव काब्यकुब्ज को है। सौ ऋषियों की भूमि सौरिख, शीरध्वज की नगरी साक्यांशपुरी (संकिसा) में आज भी उनकी आराध्य माँ बिसारी देवी के साथ गौतम बुद्ध से सम्बन्ध होने के कारण अपने दामन में प्राच्य संस्कृति, सभ्यता तथा पुरा सम्पदा संजोये है। भोजपुर राजा भोज से संम्बन्ध जोड़ता है। प्राचीन प्रासाद के खण्डहर अवशेष अपनी कहानी स्वयं कहते हैं।
वर्तमान का फर्रूखाबाद प्राचीन अपरा काशी से क्षेत्र में तो सीमित है परन्तु संस्कृति, सभ्यता, मान्यताएँ तथा परम्पराएँ भिन्न नहीं मामूम पड़ती हैं। गंगा जमुनी तहज़ीब यहाँ की विशेषता है। यहाँ जितना हिन्दू सभ्यता ने उत्कर्ष किया उतना ही मुगल तहज़ीब परवान चढ़ी। यदि हिन्दुत्व में आदरभाव की प्रधानता थी तो सूफ़ी दर्शन ने सामाजिक ताना बाने को दिशा दी। दोनों सभ्यताएँ इतनी इकसार और एकाकार हुई कि आज अलग करके आंकना मुश्किल ही नहीं वरन असम्भव सा प्रतीत होता है। यही कारण है कि यहाँ की भाषा जाबान में हिन्दी का स्वभावतः खरापन पांडित्य तो उर्दू की मिठास का पुट बरबस अपनी ओर आकर्षित करता है। कसरहट्टे की परात व पीतल कांसे के बर्तनों ने अपना लोहा मनवाया तो वहीं नाज़ुक हाथों का अद्भुत कमाल जरी हस्तशिल्प व लिहाफ़ की छपाई ने देश ही नहीं विदेशों में अपनी धाक जमायी।
फर्रूखाबाद की नींव आज से 128 वर्ष पूर्व दिल्ली के सुल्तान नबाब फर्रूखशियर बंगस ने रखी। उस समय इस क्षेत्र में जंगल ही जंगल था। उनके पुत्रों ने अपने नामों से कायमगंज, मोहम्मदाबाद, खुदागंज, कमालगंज सहित फर्रूखाबाद की नींव डाली।
खुदागंज में सन् 1850 में नबाब अहमद खां बंगश ने अवध के नबाब द्वारा भेजे गये राजा नवलराय को यहाँ परास्त कर फर्रूखाबाद पर पुनः अधिकार कर लिया। वर्ष 1859 में अंग्रेज कमांडर एकोलिन के केंपबेल ने फतेहगढ़ की ओर बढ़ते क्रान्तिकारियों को शिकस्त दी। प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में खुदागंज के पास लोहे का पुल था जिसे हकीम मेंहदी अली ने बनावाया था। जिसके आज अवशेष नहीं हैं खुदागंज का पूर्व नाम सिनौली था। सन् 1940 में नेता जी सुभाष चन्द बोस को यहाँ बुलाने का श्रेय पं. नित्यानन्द शर्मा व रामकृष्ण सारस्वत को जाता है। 1927 को यहाँ महात्मा गाँधी का आगमन मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली के साथ हुआ। उस समय जनसमूह से प्रभावित होकर गाँधी जी 1929 को पुनः फर्रूखाबाद आये। हाजी विलायत अली खां ने तबले की फर्रूखाबाद घराने की नींव डाली। यह कला दिल्ली में पली बढ़ी। इनके शिष्यों में उस्ताद चूडियाँ, इमाम मुबारक अली और घुन्नू खां शामिल थे। आज इस कला को बढ़ाने में काली चरण गौड़, पुत्तू मास्टर, संगीत शिक्षक ब्रज बिहारीदास, विद्याप्रकाश दीक्षित प्रमुख हैं। आज इस कला को पुनः जीवत करने में संस्कार भारती का योगदान सराहनीय एवं स्तुत्य है।
आलू और फर्रूखबाद का मानो चोली दामन का साथ है। खरा आदमी-खारा पानी जैसे यहाँ की पहचान है। स्पष्टवादिता और हुनर के बूते पहचान बनाने में यहाँ की प्रज्ञा को जैसे महारत हासिल हो। यहाँ की मिट्टी में खरापन इतना रचा बसा है कि हर तरफ खरी-खोटी से रूबरू होना लाजिमी है, और हाँ अंत में यही कहना जिसके कारण यह प्राचीन मुहाविरा मशहूर हो गया-
"खरा खेल फर्रूखाबादी"

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