| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 10.14.2007 |
| नहीं बाँटते अब दर्द शब्द, शब्दों का रचना सिंह |
|
शब्द सहलाते थे शब्दों को
शब्द दुलारते शब्दों को शब्द निहारते थे शब्दों को समय वो और था जब शब्द पुकारते थे शब्दों को और शब्द सुनते थे शब्दों को अब तो धमाके होते हैं जो कान बहरे करते हैं शब्दों को निशब्द करते हैं अब सन्नाटा है सूना है आंगन शब्दों का बंद हो गये हैं सब वह दरवाज़े जहाँ से आना जाना था "आयत", और "शबद" , "श्लोक", और "टेसटामेन्ट" का अब शब्द देते हैं व्यथा शब्दों को नहीं बाँटते अब दर्द शब्द, शब्दों का |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|