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03.30.2008
 
हाँ , तुम नारी हो
रचना सिंह

क्यों तुम लड़ती रहीं
क्यों तुम जूझती रहीं
क्यों तुम चाहती हो
बदलना मानसिकता औरों की
क्या फ़र्क हैं फिर तुममें और उनमें
मत जूझो, मत लड़ो
मत और समय अपना बरबाद करो
मत बदलो किसी की मानसिकता
हो सके तो बदलो अपनी मानसिकता
जियो उस स्वतंत्रता को जो
इश्वरीय देन, जो नहीं कोई और तु्म्हें देगा
नारी हो नारी ही बन कर रहो
प्यासी हो तो पानी पीयो
भूखी हो तो खाना खाओ
पर मत लड़ो, मत जूझो
और नारी होने के एहसास से सम्पूर्णता पाओ
अधूरी तुम नहीं हो, क्योंकि तुम जिनसे लड़ती हो
उनके अस्तिव की तुम ही तो जननी हो
तुम ख़ुद आक्षेप और अवेहलना करती हो
अपनी इच्छाओं की,
कब तक अपनी कमियों का दोष
दूसरो पर डालोगी
समय जो बीत जाता है लौट कर नहीं आता है


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