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04.05.2008
 
बदले हुए युग की सीता और अहल्या
रचना सिंह

क्यों बनू अल्या मैं
शापित जीवन क्यों मै काटूँ
बन कर इक शिला
जीवन अगर मेरा शापित है
तो भी क्यों न उसे जीऊँ मैं
क्यों इंतज़ार करूँ मैं
किसी राम के आगमन का
नहीं मैं अहिल्या नहीं बनूँगी
युग अब बदल गया है
मर्यादा पुरुषोतम
राम नाम
कही खो गया है
जो पत्थर मे डाल सकें प्राण
और शाप ना देना मुझको
ना लेना अब कोई परीक्षा
क्योंकि युग बदल गया है
अब ऐसी ग़लती न करना
बदले हुए युग की सीता
और अहिल्या ने अब
लक्ष्मण रेखा अपने
चारों और खींच ली है
जहाँ आकर तुम्हारे
शाप की परिधि समाप्त हो जाती है
और तुम्हारे भस्म होने की
सीमा शुरू हो जाती है


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