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09.01.2007
 
अनसुनी कर दो हर वह दस्तक़
रचना सिंह

अनसुनी कर दो हर वह दस्तक़
जो दिल के दरवाज़ों पर होती है

आज कल का वक़्त सही नहीं है
ना जाने कब कौन अजनबी
एक दस्तक़ दे और फिर
चला जाये तुम्हारे जज़्बातों की
गठरी को समेट कर

बाद में ढूँढना बहुत मुश्किल होगा
क्योंकी जो दिल मे बसते हैं
उनकी तस्वीर कैसे किसी को दिखाओगे
और उन्हें चोर कैसे कह पाओगे
अच्छा होगा
अनसुनी कर दो हर वह दस्तक़
जो दिल के दरवाजों पर होती


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