रचना सिंह


कविता

अनसुनी कर दो हर वह दस्तक़
आज की नारी हूँ
आयत और श्लोक
एक संवाद
एक और संवाद
गंधाती सड़क
तुम्हारे अस्तित्व की जननी...
दो पल
निशब्द फिर भी शब्द होते हैं
नहीं बाँटते अब दर्द शब्द, शब्दों का
प्रीत ---- वि - प्रीत
बदले हुए युग की सीता और...
मनाई, बंदिश और नियम
माँ का आँचल
वह चीख चीख कर कहती है मैं
विष विरह चौरा और त्रिया चरित
शब्द कहाँ से लाऊँ वो?
सिर्फ सोलह साल
हम किराये पर लेते हैं विदेशी कोख
हाँ , तुम नारी हो