अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 

ये कैसी होली है
रचना श्रीवास्तव


गुलाल से सजा न अम्बर है
सुना सूना घर आँगन है
घरती भी हुई न कहीं गीली है
ये कैसी होली है

रंगों में डूबा तन मन है कहाँ
आपनों का भी न संग है यहाँ
रंग लगाती न कोई हमजोली है
ये कैसी होली है

खूब हुड़दंग मचाते थे
बुरा न मनो होली है कहके बच जाते थे
आज सुनाई न देती ये बोली है
ये कैसी होली है

सब पे चढ़ता था प्रेम रंग
फागुन का होता है कुछ ऐसा ढंग
मौसम फागुन का पर फगुआ गति न कोई टोली है
ये कैसी होली है

पापड़ चिप्स छत पे न फैले हैं
गुझियों की खुशबू भी आई नहीं
भंग मे डूबी न मस्तानों की टोली है
ये कैसी होली है

रंग लगाने का मनावन नहीं
रूठा कोई मनभावन नहीं
सजनी न करती सजन से ठिठोली है
ये कैसी होली है


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें