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01.31.2009
 

शरद ऋतु
रचना श्रीवास्तव


ग्रीष्म में तपते
साये, जलते मन
सुलगती हवाएँ
शरद ऋतु के आगमन पे
हर्षित हो जायें

गुलाबी ठण्ड की
आहट लिए
प्रकृति का करता सिंगार
शरद ऋतु की सुषमा
है शब्दों से पार

श्वेत नील अम्बर तले
नव कोपलें फूटती है
कमल कुमुदनियों
की जुगल बंदी से
मधुर रागनी छिड़ती है

भास्कर की मध्यम तपिश
सुधा बरसाती चांदनी
धरती के कण कण में
प्रेम रस छलकाती है
मौसम की ये अँड़ा
विरह प्रेमियों के हृदय में
टीस सी उठाती है


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