अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 

प्यार को जो देख पाते
रचना श्रीवास्तव


भैया ...
काश तुम समझ पाते
पापा की झिड़कियों में था
तुम्हारा ही भला
उनके गुस्से में छुपे
प्यार को जो देख पाते
तो शायद
तुम घर छोड़ के नहीं जाते

पापा के ठहाकों से
जो गूँजता था घर कभी
आज उनकी
बोली को तरस जाता है
तुम्हारे कमरे मे
बैठे न जाने क्या
देखते रहते हैं
अकेले मे कई बार
बाते करते हैं
पापा अब बुझ से गए हैं

उनकी डाँट को
गाँठ बाँध लिया
पर न देखा की
तुम्हारी सफलता को
"मेरे बेटे ने किया है
बेटे को मिला है"
कह के
सब को कई बार बताते थे
तुम्हारे सोने के बाद
तुम्हें कई बार
झाँक आते थे
क्यों नहीं
देखा तुम ने
कि खीर पापा कभी
पूरी कटोरी नहीं खाते थे
तुम्हारी पसंद के
फल लाने
कितनी दूर जाते थे
अपने वेतन पे लिया कर्ज़
तुम्हारी मोटर साईकिल लाने को
काम के बाद भी किया काम
तुम्हें मुझे ऊँची शिक्षा दिलाने को

तुमने उन्हें दिया
मधुमे, उच्च रक्तचाप,
छुप के रोती
आँखों को मोतिया
ले ली उनकी मुस्कान
उनकी बातें
उनका गर्व से उठा सर
और सम्मान
यदि तुम ये सब जानते
तो शायद नहीं जाते

आ जाओ
इस से पहले
के कहीं देर न हो जाए
पितृ दिवस पे तो पिता को
बेटे का उपहार दे जाओ
तुम आ जाओ


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें