अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
05.03.2012
 

माँ की कुछ छोटी कवितायें
रचना श्रीवास्तव



कब मुझको है
जरूरत पैसे की
वो जानती थी
चुप चाप २ रुपये मेरे हाथ मै धर देती थी
आज मुझको समझ आया
१० की सब्जी ८ में
कराने को
वो सब्जी वाले से
क्यों झिकझिक करती थी

ज्यादा बिजली का बिल आएगा
पिता दुहाई देते रहते
फिर भी कमरे में मेरे
अँधेरा किया नहीं उसने
क्योंकि उनको पता था
अँधेरों से डरती हूँ मैं

माँ तीज त्यौहार मौसम की
बातें करती है
व्रत उपवास पूर्णिमा कब है
बताती है
पिता बेकार बात करती हो कहते हैं
पर उनको पता नहीं
कि माँ मेरे चारों ओर
संस्कार फैला रही होती है

गाँव मोहल्ले
रिश्ते नातेदारों का
हाल विस्तार से बताती है
ख़ुद का पूछो तो
"ठीक हूँ" कह
चुप हो जाती है
थोड़ी देर मे पुनः
सब का हाल बताने लगती है
माँ ने आपने लिए
ठीक हूँ शब्द खरीद लिया है

सब की सुनती है
चुप रहती है
तभी शायद
अकेले में बड़बड़ाती है माँ


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें