अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली

मुख पृष्ठ
07.17.2014


कल, आज और कल

पुराने पल
शाखों से झड़ते रहे
कल, आज और कल

एक मैली सी
गठरी में
कुछ सहेज के रखा था
कुछ पल थे
यादों के
ग़म कोई जो खटका था
पीड़ा के शूल
दिलों में गड़ते रहे
कल, आज और कल

बीते लम्हे
खोले तो
झरना सा बह उठा
भीगा
आज तुम्हारा
हौले से कह उठा
नाहक तुम
अतीत से लड़ते रहे
कल आज और कल

पुराने पल
शाखों से झड़ते रहे
कल आज और कल


अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें