रचना श्रीवास्तव


कविता

अपनों के बीच भी कहाँ...
अलविदा
कल, आज और कल
दुआ
दोहरा जीवन जीते हैं हम
दर्द घुटन और औरत
नूतन वर्ष
प्यार को जो देख पाते
प्रेम बाहर पलेगा
बटवारा
बुधिया सोचती है
माँ की कुछ छोटी कवितायें
मैं कुछ कहना चाहती हूँ
मौत
ये कैसी होली है
विस्फोट
शरद ऋतु
शोर
समीकरण
हथेली पर सूरज

दीवान

कुर्बत इतनी न हो कि..
बदलना चाहो भी तो

बाल-साहित्य

प्यारी दुनिया
मुझे फेरी गॉड मदर नहीं बनना
मुझे माँ के पास सोना है
मुझको पंख चाहिए
 हलवा

कहानी

गुलमोहर से अमलतास तक
भरोसा

आलेख
बाथ टब की होली