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ISSN 2292-9754

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01.13.2016

 

समय चक्र
रचना गौड़ ’भारती‘


मालती एक शादीशुदा औरत है, अपने परिवार के साथ अपने सुखी जीवन में संतुष्ट। लेकिन यह संतुष्टि उसे काफी संघर्षों के बाद मिली। नई नवेली को इस घर में आने पर काफी कुछ बेबुनियाद बातों का सामना करना पड़ा। आज वर्षों बाद पुनः वही प्रंसग पर बात आयी जब उसकी सास अपनी आपबीती के साथ जीवन में परिवर्तन के बारे में उससे कह रही थीं- मालती, तुम्हारे ससुर जी के जाने के बाद आज मैं अपने आप को सँभाल नहीं पा रही हूँ ।

मालती- माँ जी, हर किसी के जीवन में अच्छा व बुरा हर प्रकार का समय आता है, उसमें परिवर्तन लाकर ही वो अपनी जीवन यात्रा सफल बना सकता है।

ऐसा नहीं है कि मैं परिवर्तन नहीं लाना चाहती पर थोड़ा समय तो मिलना चाहिए मुझे। सब कहते हैं मैं अपने आप को बदलूँ  - माँ ने कहा।

यही जीवन की कसौटी है। जब नई दुल्हन आती है, वो अपने घर, रिवाज व वातावरण से परे माहौल को अपनाना चाहते हुए भी समयाभाव के कारण कभी-कभी हार जाती है तो उसपर नाकामयाबी की मुहर लग जाती है। क्या उसे अपने जीवन परिवर्तन का समय दिया जाता है।

मैं समझ रही हूँ, तुम क्या कहना चाहती हो। मुझे आज यह सब समझ आ रहा है।

मालती बोली, समय निकल जाता है बस बातें रह जाती हैं। मैं तो इतना ही चाहती हूँ कि हर कोई व्यक्ति अपने जीवन व उसकी कठिनाईयों का ध्यान रखते हुए ही दूसरों को कुछ समय व मौका दें तो प्यार व अपनापन उसे जरूर अपना बनाएगा।

माँ ने समझते हुए कहा – अगर ये बातें सभी समझ लें तो रिश्तों में कभी दरार न आएगी और संपूर्ण सामंजस्य एक सफल जीवन और उनके रिश्तों का निर्माण करेगा।

 


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