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| 11.05.2007 |
| सोचते ही ये
अहले-सुख़न रह गये आर.पी. शर्मा ’महरिष’ |
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सोचते ही ये अहले-सुख़न रह गये
गुनगुना कर वो भँवरे भी क्या कह गये इस तरह भी इशारों में बातें हुईं लफ्ज़ सारे धरे के धरे रह गये नाख़ुदाई का दावा था जिनको बहुत रौ में ख़ुद अपने जज़्बात की, बह गये लब, कि ढूँढा किये क़ाफ़िये ही मगर अश्क़ आये तो पूरी ग़ज़ल कह गये महरिष, उन कोकिलाओं के बौराए स्वर अनकहे, अनछुए-से कथन कह गये |
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