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12.09.2007
 
नाकर्दा गुनाहों की मिली यूँ भी सज़ा है
आर.पी. शर्मा ’महरिष’

नाकर्दा गुनाहों की मिली यूँ भी सज़ा है
साक़ी नज़रअंदाज़ हमें करके चला है

क्या होती है ये आग भी, क्या जाने समंदर
कब तिश्नालबी का उसे एहसास हुआ है

उस शख़्स के बदले हुए अंदाज़ तो देखो
जो टूटके मिलता था, तकल्लुफ़ से मिला है

पूछा जो मिज़ाज उसने कभी राह में रस्मन
रस्मन ही कहा मैंने कि सब उसकी दुआ है

महफ़िल में कभी जो मिरी शिरकत से ख़फ़ा था
महफ़िल में वो अब मेरे न आने से ख़फा है

क्यों उसपे जफ़ाएँ भी न तूफ़ान उठाएँ
जिस राह पे निकला हूँ मैं, वो राहे-वफ़ा है

पीते थे न ’महरिष, तो सभी कहते थे ज़ाहिद
अब जाम उठाया है तो हंगामा बपा है।

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