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| 11.05.2007 |
| लाया था जो
हमारे लिये जाम, पी गया आर.पी. शर्मा ’महरिष’ |
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लाया था जो हमारे लिये जाम, पी गया
क़ासिद हमारे नाम का पैग़ाम पी गया कुछ इस तरह सुनाई हमें उसने दास्तां आया जो इख़्तिताम, तो अंजाम पी गया पलकों पे कोई दीप जलाये तो किस तरह आँसू बचे थे जो दिले-नाकाम पी गया लेले के नाम सबको पुकारा किया, मगर साक़ी को देखिये कि मेरा नाम पी गया महरिष’, ये दर्द, रिदे-बलानोश है कोई सब दिन का चैन, रात का आराम पी गया |
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