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| 12.27.2007 |
| जाम हम बढ़के उठा लेते आर.पी. शर्मा ’महरिष’ |
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जाम हम बढ़के उठा लेते, उठाने की तरह
क्यों न पीते जो पिलाते वो पिलाने की तरह तुम ठहरने को जो कहते, तो ठहर जाते हम हम तो जाने को उठे ही थे, न जाने की तरह कोई आँचल भी तो हो उनको सुखाने के लिए अश्क तब कोई बहाए भी, बहाने की तरह टीस कहती है वहीं उठके तड़पती-सी ग़ज़ल दिल को जब कोई दुखाता है, दुखाने की तरह गर्मजोशी की तपिश भी तो कुछ उसमें होती हाथ ‘महरिष’, जो मिलाते वो मिलाने की तरह |
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