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| 12.09.2007 |
| इरादा वही जो अटल बन गया है आर.पी. शर्मा ’महरिष’ |
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इरादा वही जो अटल बन गया है
जहाँ ईंट रक्खी, महल बन गया है ख़्याल एक शाइर का आधा-अधूरा मुक़म्मल हुआ तो ग़ज़ल बन गया है कहा दिलने जो शेर भी चोट खाकर मिसाल इक बना, इक मसल बन गया है पुकारा है हमने जिसे ‘आज’ कह कर वही ‘वक्त’ कम्बख़त‘कल’ बन गया है ये दिल ही तो है, भरके ज़ख़्मों से‘महरिष’ खिला, और खिल कर कमल बन गया है |
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