अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
12.27.2007
 
हिचकियाँ
आर.पी. शर्मा ’महरिष’

जैसी तुम से बिछुड़ कर मिलीं हिचकियाँ
ऐसी मीठी तो पहले न थीं हिचकियाँ

याद शायद हमें कोई करता रहा
दस्तकें दर पे देती रहीं हिचकियाँ

मैंने जब-जब भी भेजा है उनके लिए
मेरा पैग़ाम लेकर गईं हिचकियाँ

फासला दो दिलों का भी जाता रहा
याद के तार से जब जुड़ीं हिचकियाँ

जब से दिल उनके ग़म में शराबी हुआ
तब से हमको सताने लगीं हिचकियाँ

उनके ग़म में लगी आँसुओं की झड़ी
रोते-रोते हमारी बंधीं हिचकियाँ

उनको ‘महरिष’, जिरा नाम लेना पड़ा
तब कहीं जाके उनकी रुकीं हिचकियाँ

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें