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12.09.2007
 
है भँवरे को जितना कमल का नशा
आर.पी. शर्मा ’महरिष’

है भँवरे को जितना कमल का नशा
किसी को है उतना ग़ज़ल का नशा

पियें देवता शौक से सोमरस
महादेव को है गरल का नशा

हैं ख़ुश अपने कच्चे घरौंदों में हम
उन्हें होगा अपने महल का नशा

पिलाकर गया है कुछ ऐसी अतीत
उतरता नहीं बीते कल का नशा

कोई ‘गीतिका’ छंद में है मगन
किसी को है ‘बहरे-रमल’ का नशा

बड़ी शान से अब तो पीते हैं सब
कि फ़ैशन हुआ आजकल का नशा

पियो तुम तो ‘महरिष’ सुधा शांति की
बुरा युद्ध का एक पल का नशा

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