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| 12.27.2007 |
| गीत ऐसा कि जैसे कमल चाहिये आर.पी. शर्मा ’महरिष’ |
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गीत ऐसा कि जैसे कमल चाहिये
उसपे भंवरों का मंडराता दल चाहिये एक दरिया है नग़्मों का बहता हुआ उसके साहिल पे शामे-ग़ज़ल चाहिये जिसको जीभर के हम जी सकें, वो हमें शोख़, चंचल, मचलता-सा पल चाहिये और किस रोग की है दवा शाइरी कुछ तो मेरी उदासी का हल चाहिये ख़ैर, दो-चार ही की न ‘महरिष’ हमें हम को सारे जहाँ की कुशल चाहिये |
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