अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली मुख्य पृष्ठ
11.05.2007
 
बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस
आर.पी. शर्मा ’महरिष’

बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस
न मधुमास ही वो, न पहली-सी पावस

हवाएँ भी मैली, तो झीलें भी मैली
कहाँ जाएँ पंछी, कहाँ जायें सारस

उन्हें चाहिये एक सोने की लंका,
न तन जिनके पारस, न मन जिनके पारस

वो सम्पूर्ण अमृत-कलश चाहते हैं
कि है तामसी जिनका सम्पूर्ण मानस

जो व्रत तोड़ते हैं फ़क्तू सोमरस से
बड़े गर्व से ख़ुद को कहते हैं तापस

हुआ ईद का चाँद जब दोस्त अपना
तो पूनम भी वैसी कि जैसी अमावस

अखिल विश्व में ज़ेहर फैला है ‘महरिष’
बने नीलकंठी, है किसमें ये साहस

अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें