आर.पी. शर्मा महरिष


दीवान

उनका तो ये मज़ाक रहा ...
तर्जुमानी जहान की, की है
बहारें हैं फीकी, फुहारें हैं नीरस
लाया था जो हमारे लिये ...
सोचते ही ये अहले-सुख़न...
नाकर्दा गुनाहों की मिली ..
इरादा वही जो अटल ..
मस्त सब को कर गई ..
है भँवरे को जितना कमल..
यूँ पवन, रुत को रंगीं बनाये
नाम दुनिया में कमाना चाहिये
क्यों न हम दो शब्द ...
हिचकियाँ
जाम हम बढ़के उठा लेते
गीत ऐसा कि जैसे कमल