| अन्तरजाल पर साहित्य प्रेमियों की विश्राम स्थली |
![]() |
मुख्य पृष्ठ |
| 07.14.2007 |
|
दुखों के दिन मेरे सुख में ही जिसके साथ गुज़रे हैं |
|
दुखों के दिन मेरे सुख में ही जिसके साथ गुज़रे हैं
उसी
की याद में
हर दिन मेरे लम्हात गुज़रे हैं
मेरे खामोश अरमां को
सिखाया बोलना जिसने
उसी
की
ज़ुल्फ़
को
छूकर
मेरे नग़्मात
गुज़रे हैं
कभी
बातों में तल्खी तो
कभी जुंबिश निगाहों में
इन्हीं हालात से
अब तक मेरे हालात
गुज़रे हैं
किसी गजरे के मुरझाये
मिले हैं
फूल जो
मुझको
उन्हीं
फूलों
की ख़ुशबू
से मेरे जज्बात गुज़रे हैं
ग़ज़ल मेरी
मुहब्बत की बसी जिस
गाँव में‘घायल’
उसी की
गलियों से होकर कई
हज़रात गुज़रे
हैं |
| अपनी प्रतिक्रिया लेखक को भेजें
|